किरायानामे पर शुल्क का प्रश्न लगभग हर किरायेदार और मकान मालिक के सामने आता है। सबसे आम भ्रम यह है कि किरायानामे पर एक निश्चित छोटी राशि लगती है। वास्तव में शुल्क अनुबंध की अवधि और उसमें दर्ज राशियों से जुड़ा होता है।
ग्यारह माह का अनुबंध इतना प्रचलित क्यों है
एक वर्ष से कम अवधि के अनुबंध की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल रहती है, इसलिए व्यवहार में अधिकांश किरायानामे 11 माह के बनाए जाते हैं और आवश्यकता होने पर नवीनीकृत कर दिए जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसे अनुबंध पर कोई शुल्क नहीं लगता — शुल्क लगता है, पर उसका आधार छोटी अवधि का कुल किराया होता है।
अवधि बढ़ते ही गणना बदल जाती है
जैसे ही अनुबंध एक वर्ष से आगे जाता है, गणना लीज जैसी हो जाती है — पूरी अवधि का किराया, किराया वृद्धि और अग्रिम राशि सब जुड़ जाते हैं। इसीलिए तीन वर्ष के किरायानामे और ग्यारह माह के किरायानामे का शुल्क बहुत अलग होता है।
तुलना
स्थिति A — 11 माह, किराया ₹8,000/माह → आधार राशि = ₹88,000
स्थिति B — 3 वर्ष, किराया ₹8,000/माह, वृद्धि नहीं → आधार राशि = ₹2,88,000
दोनों में मासिक किराया समान है, पर देय शुल्क समान नहीं होगा।
सुरक्षा जमा और अग्रिम राशि
यदि अनुबंध में बड़ी सुरक्षा जमा या अग्रिम राशि दर्ज है, तो वह भी मूल्यांकन में देखी जाती है। अनुबंध में यह स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि राशि वापसी योग्य है या समायोजित होगी, अन्यथा बाद में विवाद और पुनर्मूल्यांकन दोनों की संभावना बनती है।
क्या ध्यान रखें
- •अनुबंध में अवधि और आरंभ तिथि स्पष्ट लिखें
- •किराया, वृद्धि और जमा राशि अंकों तथा शब्दों में लिखें
- •नवीनीकरण की शर्त पहले से तय करें
- •पंजीकरण की आवश्यकता अवधि पर निर्भर करती है — इसे पहले जाँच लें
गणना करते समय यह ध्यान रखें कि अंतिम शुल्क का निर्धारण सम्बंधित उप-निबंधक कार्यालय द्वारा किया जाता है। इस वेबसाइट पर उपलब्ध गणना केवल अनुमानित (indicative) है।