लीज डीड तैयार कराते समय सबसे पहला प्रश्न यही आता है कि इस पर स्टाम्प शुल्क कितना लगेगा। व्यवहार में यह राशि किसी एक निश्चित दर से नहीं निकलती — यह इस बात पर निर्भर करती है कि लीज कितने वर्षों की है, किराया कितना है, कोई अग्रिम राशि या प्रीमियम दिया जा रहा है या नहीं, और सुरक्षा जमा (security deposit) की स्थिति क्या है।
इसीलिए दो लोगों की लीज डीड, एक ही शहर में, एक ही दिन बनने पर भी अलग-अलग शुल्क वाली हो सकती है। नीचे उन तत्वों को क्रम से समझा गया है जिनसे गणना बनती है।
गणना का आधार: मालियत (consideration value)
स्टाम्प शुल्क सीधे किराए पर नहीं, बल्कि लीज से निकलने वाली कुल मालियत पर लगता है। सामान्यतः मालियत में लीज अवधि का किराया, किराया-वृद्धि (escalation) का प्रभाव, अग्रिम/प्रीमियम राशि तथा — जहाँ लागू हो — सुरक्षा जमा जोड़ी जाती है।
- •मासिक किराया और लीज की कुल अवधि
- •किसी निश्चित अंतराल पर तय किराया वृद्धि
- •अग्रिम भुगतान / प्रीमियम / एकमुश्त राशि
- •सुरक्षा जमा (यदि लौटाई नहीं जा रही या शर्तों के अनुसार गणना योग्य है)
लीज अवधि सबसे निर्णायक तत्व है
अवधि जितनी लंबी होगी, मालियत उतनी ही बढ़ेगी। छोटी अवधि के किरायानामे और लंबी अवधि की लीज को एक ही तराजू पर नहीं तौला जाता। तीस वर्ष से अधिक अवधि वाले प्रकरण अलग श्रेणी में आते हैं और उनका मूल्यांकन सामान्य गुणक पद्धति से नहीं किया जाता — ऐसे मामलों में उप-निबंधक कार्यालय से पुष्टि आवश्यक है।
किराया वृद्धि का असर
यदि अनुबंध में हर वर्ष या हर कुछ वर्षों पर किराया बढ़ने की शर्त है, तो केवल वर्तमान किराया लेकर गणना करना गलत परिणाम देगा। पूरी अवधि का वास्तविक कुल किराया निकालना पड़ता है, तभी मालियत सही बनती है।
उदाहरण से समझें
मासिक किराया: ₹10,000
लीज अवधि: 5 वर्ष
किराया वृद्धि: कोई नहीं
कुल किराया = 10,000 × 12 × 5 = ₹6,00,000
इसी कुल राशि (तथा अन्य लागू राशियों) के आधार पर मालियत बनती है, और उसी पर शुल्क की गणना होती है।
अब यदि इसी उदाहरण में हर वर्ष 10% किराया वृद्धि होती, तो पाँच वर्ष का कुल किराया ₹6,00,000 से काफी अधिक निकलता — और स्टाम्प शुल्क भी उसी अनुपात में बढ़ता।
पंजीकरण शुल्क अलग है
स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण शुल्क दो अलग मदें हैं। कई लोग इन्हें एक मान लेते हैं और बजट में कमी रह जाती है। दस्तावेज़ के पंजीकरण के समय दोनों देय होते हैं, इसलिए अनुमान लगाते समय दोनों को अलग-अलग देखना चाहिए।
व्यावहारिक तरीका
- •अनुबंध की शर्तें (अवधि, किराया, वृद्धि, जमा) पहले लिखित रूप में तय करें
- •पूरी अवधि का कुल किराया निकालें, केवल मासिक किराया न देखें
- •अग्रिम राशि और सुरक्षा जमा की स्थिति स्पष्ट करें
- •अनुमानित गणना निकालकर उसे उप-निबंधक कार्यालय की सलाह से मिलाएँ
गणना करते समय यह ध्यान रखें कि अंतिम शुल्क का निर्धारण सम्बंधित उप-निबंधक कार्यालय द्वारा किया जाता है। इस वेबसाइट पर उपलब्ध गणना केवल अनुमानित (indicative) है।